रायपुर। छत्तीसगढ़ में बिजली दरों में बढ़ोतरी के फैसले ने आम जनता की जेब पर सीधा असर डाल दिया है। जहाँ एक ओर सरकार ने स्टील उद्योगों को ₹1400 करोड़ की राहत दी है, वहीं दूसरी ओर आम उपभोक्ताओं के लिए बिजली महंगी कर दी गई है।
ऊर्जा नियामक आयोग के नए आदेश के मुताबिक, घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली दरें औसतन 10% तक बढ़ाई गई हैं, जबकि उद्योगों के लिए 25% तक की राहत दी गई है। इससे यह सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सरकार किसके हित में फैसले ले रही है — उद्योगपतियों के या जनता के ?
जनता से कमाई, उद्योगों को छूट – किसके लिए काम कर रही सरकार ?
विपक्ष और उपभोक्ता संगठनों ने सरकार पर आरोप लगाया है कि जनता की जेब से वसूले गए पैसे से बड़े उद्योगों को फायदा पहुँचाया जा रहा है।
एक तरफ घरेलू उपभोक्ता बढ़े हुए बिलों से परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर स्टील कंपनियों को भारी छूट देकर सरकार ने उद्योगपतियों को राहत दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से सरकार को ₹1400 करोड़ का नुकसान हुआ है, लेकिन यह नुकसान जनता पर बिजली दरों के रूप में वसूला जा रहा है।
जनता पर बोझ क्यों?
ग्रामीण और मध्यम वर्गीय उपभोक्ता पहले से ही महँगाई की मार झेल रहे हैं। अब बिजली बिलों में बढ़ोतरी ने उनका बजट और बिगाड़ दिया है। कई उपभोक्ता संगठनों ने सरकार से इस नीति को तुरंत वापस लेने की माँग की है।
भ्रष्टाचार और पारदर्शिता पर उठे सवाल
छोटे उद्योगों ने भी नियामक आयोग पर भेदभाव और मनमानी के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बड़े उद्योगों को फायदा पहुँचाने के लिए छोटे व्यापारियों की उपेक्षा की जा रही है।
विपक्ष और आम जनता की माँग
जनता का कहना है कि बिजली दरों में बढ़ोतरी को वापस लिया जाए और पारदर्शी नीति के तहत सभी वर्गों को समान राहत दी जाए।
विपक्षी दलों ने कहा —
सरकार जनता से कमाई कर रही है और उद्योगपतियों को फायदा पहुँचा रही है। यह जनविरोधी नीति है।
जनहित में सवाल
जब राज्य को ₹1400 करोड़ का नुकसान हो रहा है तो राहत सिर्फ उद्योगों को क्यों?
आम जनता से वसूली जा रही राशि कहाँ जा रही है?
सरकार पारदर्शी नीति अपनाने से क्यों बच रही है ?
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