संदेश भारत , जगदलपुर। छत्तीसगढ़ का विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी अनूठी जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में रथ परिक्रमा की अंतिम रस्म ‘रैनी’ परंपरागत तरीके से निभाई गई। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव चोरी किए गए रथ को खोजते हुए कुम्हड़ाकोट के जंगल पहुंचे। यहां उन्होंने ग्रामीणों के साथ बैठकर नवाखाई की खीर खाई और परंपरा के अनुसार रथ को वापस राजमहल लाया गया।
परंपरा के अनुसार, विजयदशमी की रात माड़िया और गोंड जनजातियों के ग्रामीण रथ को राजमहल परिसर से ले जाकर करीब चार किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा देते हैं। इसके बाद ग्रामीण राजपरिवार के सदस्य को अपने बीच आमंत्रित करते हैं और नवाखाई की रस्म निभाई जाती है। नवाखाई नई फसल के चावल से जुड़ी परंपरा है, जिसमें नई उपज का सेवन किया जाता है।
इस रस्म के दौरान राजपरिवार के सदस्य ने ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर नए चावल से बनी खीर खाई। इसके बाद ग्रामीणों को मनाकर रथ को वापस लाया गया। यह परंपरा राजपरिवार और आदिवासी समाज के बीच आपसी संबंध, लोक आस्था और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक मानी जाती है।
बस्तर दशहरा की इस अनूठी रस्म को देखने के लिए बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग, बस्तरवासी और दूसरे राज्यों से आए पर्यटक मौजूद रहे। आधुनिक समय में भी इस परंपरा का निर्वहन बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
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