सरकारी शिक्षक को सच बोलना पड़ा भारी

सरकारी शिक्षक को सच बोलना पड़ा भारी


राज्योत्सव के उत्सव के बीच जब शिक्षक ने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर बच्चों को किताबें न मिलने की वास्तविक स्थिति साझा की, तो विभाग ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए तत्काल निलंबित कर दिया।


सरकारी शिक्षक को सच बोलना पड़ा भारी, व्हाट्सऐप  स्टेटस पर हुई कार्रवाई — शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने पर तत्काल निलंबन


संदेश भारत रायपुर।छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के कुरूद ब्लॉक के ग्राम नारी में पदस्थ एक सरकारी शिक्षक को स्कूल की सच्चाई उजागर करना महंगा पड़ गया। राज्योत्सव के उत्सव के बीच जब शिक्षक ने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर बच्चों को किताबें न मिलने की वास्तविक स्थिति साझा की, तो विभाग ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए तत्काल निलंबित कर दिया।


लेकिन जब संदेश भारत की टीम मौके पर पहुँची, तो सच्चाई बिल्कुल उलट निकली। स्कूल में हिंदी की नई किताबें अब तक नहीं पहुँची हैं।


बच्चों के पास किताबें नहीं

ग्राम नारी की नई प्राथमिक शाला में कुल 21 बच्चे पढ़ते हैं — 11 बालक और 10 बालिकाएँ। लेकिन शिक्षा विभाग की ओर से हिंदी विषय की एक भी नई पुस्तक स्कूल में नहीं भेजी गई। बच्चे पुरानी किताबों से किसी तरह पढ़ रहे हैं।

स्कूल में महज 8 पुरानी किताबें हैं, जिनसे तीन-तीन बच्चे मिलकर पढ़ते हैं। कई बच्चे बिना किताब के ही घर लौट जाते हैं। पढ़ाई के दौरान बच्चों के बीच किताबों को लेकर झगड़े की नौबत तक आ जाती है।


शिक्षक का व्हाट्सऐप स्टेटस बना विवाद


शिक्षक ढालू राम साहू ने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर लिखा था

“बच्चों की शिक्षा व्यवस्था ठप्प है और हम राज्योत्सव मनाने चले हैं। हमारे जनप्रतिनिधियों को यह सब नहीं दिखता। जहाँ खाने-पीने की सुविधाएँ हों, वहीं काम करते हैं। जब तक बच्चों को पूरी पुस्तकें नहीं मिलेंगी, सहायक शिक्षक से लेकर कलेक्टर और शिक्षा मंत्री तक का वेतन रोक देना चाहिए।”

इस पोस्ट के बाद जिला शिक्षा अधिकारी अभय कुमार जायसवाल ने उन्हें निलंबित करने का आदेश जारी किया। आदेश में लिखा गया कि यह कार्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 के विरुद्ध है।


HIGHLIGHTS 

1. क्या सच बोलना अनुशासनहीनता है?

2. ग्रामीण स्कूलों में बच्चे किताबों के 

3. स्कूल में हिंदी की नई किताबें अब तक नहीं पहुँची

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विभाग के दावों की पोल खुली


जब हमारी टीम ने जिला शिक्षा अधिकारी से सवाल किया, तो उन्होंने कहा कि स्कूल में किताबें वितरित हो चुकी हैं। लेकिन स्कूल में मौजूद बच्चों और शिक्षकों ने साफ बताया कि अब तक नई किताबें नहीं मिलीं।


 अब बड़ा सवाल


क्या सच बोलना अनुशासनहीनता है?
क्या एक शिक्षक का अपने विद्यार्थियों की समस्या बताना गलत है?
जब राज्य सरकार राज्योत्सव पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, तब ग्रामीण स्कूलों में बच्चे किताबों के लिए तरस रहे हैं।

सिस्टम की यह चुप्पी क्या बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?
और क्या शिक्षा विभाग को पहले अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए, बजाय उन शिक्षकों को सज़ा देने के जो सच्चाई दिखाने की हिम्मत करते हैं?

Author heeralal

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